"महाभारत खण्ड १०" को बिचमा भिन्नता

(==द्रौपदी स्वयंवर== [[चित्र:DroptiSvayamvar1.jpg|thumb|right|400px|अर्जुन द्... को साथमा पृष्ठ शृजना भयो)
 
==द्रौपदी स्वयंवर==
[[चित्र:DroptiSvayamvar1.jpg|thumb|right|400px|अर्जुन द्वारा विराट सभा मा मत्स्य भेदन]][[File:DroptiSvayamvar1.jpg|thumb|अर्जुन द्वारा पांचाल सभा में मत्स्य भेदन]]
वहाँ भन्दा एकचक्रा नगरी मा गएर उनि मुनि को वेष मा एक [[ब्राह्मण]] को घर मा निवास गर्न लगे। फेरि बक नामक राक्षस को वध गरेर व्यास जी को भन्ए पछि उनि [[पांचाल]]-राज्य मा, जहाँ [[द्रौपदी]] को स्वयंवर हुनेवाला थियो,गए।[[पांचाल]]-राज्य मा अर्जुन को लक्ष्य-भेदन को कौशल देखि मत्स्यभेद भए पछि पाँचों पाण्डवों ले द्रौपदी को पत्नीरूप मा प्राप्त गर्यो।द्रौपदी पंच-कन्याहरुमा भन्दा एक छं जसलाई चिर-कुमारी भनिन्छ। जब पाण्डव तथा कौरव राजकुमारों को शिक्षा पूर्ण भयो त उनले द्रोणाचार्य को गुरु दक्षिणा दिन चाहा। द्रोणाचार्य को द्रुपद को द्वारा गरिएको आफ्नो अपमान को स्मरण हो आयो र उनले राजकुमारों देखि कहा, “राजकुमारों! यदि तिमी गुरुदक्षिणा दिन नै चाहते हो त पाञ्चाल नरेश द्रुपद को बन्दी बनाएर मेरो समक्ष प्रस्तुत करो। यही तिमी मान्छेकी गुरुदक्षिणा होगी।” गुरुदेव को यस प्रकार भन्ए पछि समस्त राजकुमार आफ्नो-आफ्नो अस्त्र-शस्त्र लिएर पाञ्चाल देश तिर चले।
 
 
पाण्डवों को जीवित होने तथा द्रौपदी संग विवाह भएको कुरा जोड भन्दा सबै ओर फैल गई। हस्तिनापुर मा यस समाचार को मिलए पछि दुर्योधन र उनको सहयोगिहरु को दुःख को पारावार न रहयो। उनि पाण्डवहरुलाई उनको राज्य लौटाना हैन चाहते थिए किन्तु भीष्म, विदुर, द्रोण आदि को द्वारा धृतराष्ट्र को सम्झिन तथा दबाव हालन को कारण उनलाई पाण्डवहरुलाई राज्य को आधा भाग दिन को लागि विवश हुनु पर््यो। विदुर पाण्डवहरुलाई बुला लाये, धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, विकर्ण, चित्रसेन आदि सबै ले उनको अगवानी को र राज्य को खाण्डव वन नामक भाग उनलाई दे दिइएको। पाण्डवों ले उन खाण्डव वन मा एक नगरी को स्थापना गरेर उनको नाम इन्द्रप्रस्थ राखयो तथा इन्द्रप्रस्थ को राजधानी बनाएर राज्य गर्न लगे। युधिष्ठिर को लोकप्रियता को कारण कौरवों को राज्य को अधिकांश प्रजाजन पाण्डवों को राज्य मा आएर बस गये।
 
==स्रोत==
[http://sukhsagarse.blogspot.com सुखसागर] को सौजन्य से
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